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खास खबर

आईएनएस ऑटोमोबाइल्स ने लॉन्च किया नया IDEAL BULLDOZER E-RICKSHAW

मजबूती, आराम और बेहतर प्रदर्शन का बेहतरीन संगम आजमगढ़ । इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना रही आईएनएस ऑटोमोबाइल्स प्राइवेट लिमिटेड ने ग्राहकों के लिए नया IDEAL BULLDOZER E-RICKSHAW बाजार में उतारा है। कंपनी का दावा है कि यह ई-रिक्शा मजबूती, आराम और बेहतर प्रदर्शन का बेहतरीन संगम है, जो चालक और यात्रियों दोनों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।  कंपनी के अनुसार, IDEAL BULLDOZER E-RICKSHAW में मजबूत बॉडी, आकर्षक डिजाइन और आरामदायक सीटिंग व्यवस्था दी गई है, जिससे यात्रियों को सुविधाजनक सफर का अनुभव मिलता है। वहीं, चालक के लिए यह वाहन कम रखरखाव लागत और बेहतर कमाई का अवसर प्रदान करता है। कंपनी के प्रतिनिधियों ने बताया कि बढ़ती ई-रिक्शा मांग को देखते हुए इस मॉडल को आधुनिक तकनीक और बेहतर गुणवत्ता मानकों के साथ विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य स्थानीय परिवहन व्यवसाय से जुड़े लोगों को एक भरोसेमंद और लाभदायक विकल्प उपलब्ध कराना है।आईएनएस ऑटोमोबाइल्स का मानना है कि यह नया मॉडल शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में परिवहन सेवाओं को और अधिक सुगम बनाएगा। लॉन्च के साथ ह...

कानपुर: शव के साथ डेढ़ साल: मुर्दे के इलाज में खर्च कर डाले 30 लाख रुपये

कानपुर। मां की ममता, पिता की आस और पत्नी का प्यार इस कदर अंधविश्वास में बदल गया कि उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि विमलेश (35) अब इस दुनिया में नहीं रहा। इसी अंधविश्वास का फायदा उठाया दो निजी अस्पतालों और एक झोलाछाप ने, डेढ़ साल के दौरान इन लोगों ने मुर्दे के इलाज के नाम पर घर वालों के 30 लाख रुपये खर्च करा डाले। इंजेक्शन और ग्लूकोज चढ़ाते रहे और रुपये वसूलते रहे।

  विमलेश के पिता रामऔतार ने बताया कि 22 अप्रैल के बाद से करीब डेढ़ माह तक शहर से लेकर पीजीआई तक के डॉक्टरों से संपर्क किया। इस दौरान कई प्रतिष्ठित और निजी अस्पताल में विमलेश को लेकर गए। कहीं कोरोना तो कहीं हॉस्पिटल में जगह न होने का हवाला देकर अस्पताल के भीतर ही नहीं घुसने दिया गया।  इस दौरान कल्याणपुर और बर्रा के निजी अस्पतालों ने बाकायदा विमलेश को भर्ती किया और इलाज भी किया। मोटी रकम वसूलने के बाद छुट्टी कर दी। तब परिवार वालों ने झोलाछाप से संपर्क किया। वह घर आकर विमलेश का इलाज करने लगा। भाई दिनेश ने बताया कि पिछले साल 19 अप्रैल को उन्होंने सबसे पहले विमलेश को बिरहाना रोड स्थित मोती हॉस्पिटल में भर्ती कराया था। 22 अप्रैल तड़के करीब चार बजे अस्पताल प्रशासन ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस बीच अस्पताल प्रबंधन ने चार दिन में उनसे नौ लाख रुपये जमा कराए थे। रुपये जमा करने के बाद विमलेश के शव के साथ मृत्यु प्रमाणपत्र दिया था। अंतिम यात्रा के दौरान विमलेश की धड़कन चलने का एहसास हुआ, तभी से उसका इलाज कराते रहे। भाई मनोज का दावा है कि झोलाछाप के कहने पर वह कई बार ऑक्सीजन सिलिंडर घर लेकर आए थे। यहां तक कोरोना काल के समय एक लाख रुपये देकर एक ऑक्सीजन सिलिंडर खरीदा था। सिलिंडर में करीब चार लाख रुपये खर्च हुए थे। सात अक्तूबर के बाद से विमलेश को सिलिंडर नहीं लगा। परिजनों का दावा है कि झोलाछाप ने भी घर में इलाज करने के नाम पर उनसे लाखों रुपये वसूले। यहां तक कि कई रेमडेसिविर इंजेक्शन भी खरीदकर लाए। झोलाछाप इन इंजेक्शन को लगाने का दावा करता रहा। छह माह इलाज के बाद झोलाछाप ने विमलेश की नस न मिलने का दावा करते हुए इलाज से इनकार कर दिया था। मां का कहना था कि वह पहले बेटे को नहलाती थी, लेकिन बाद में सिर्फ गंगाजल से पोछने लगी थी। बेटे के साथ-साथ कमरे में साफ सफाई रखती थी। उनके बेटे की धड़कन और दिमाग चल रहा था। उसके सिर के एक बाल भी नहीं टूटे थे। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनका बेटा नहीं रहा। 

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